साथ
ना जाने क्यों सोचते हैं किसी काबिल के नहीं, दरिया को भी मिलता है सहारा किसी साहिल से ही। धूप-छाँव, रात-दिन तो काट लेता है किसी तरह से, आँधियों में तो बरगद को भी उसकी जड़ें चाहिए ही। छत न हो तो महल भी लगता है यूं वीराना-सा, हाथ सिर पे हो तो सुकून मिलता है झुकने पर भी। दीवार गिरने पर भी दुबारा उठ सकती है, मगर शर्त ये है कि घर की बुनियाद न टूटे। ...