साथ

ना जाने क्यों सोचते हैं किसी काबिल के नहीं, दरिया को भी मिलता है सहारा किसी साहिल से ही। धूप-छाँव, रात-दिन तो काट लेता है किसी तरह से, आँधियों में तो बरगद को भी उसकी जड़ें चाहिए ही। छत न हो तो महल भी लगता है यूं वीराना-सा, हाथ सिर पे हो तो सुकून मिलता है झुकने पर भी। दीवार गिरने पर भी दुबारा उठ सकती है, मगर शर्त ये है कि घर की बुनियाद न टूटे। ...

December 20, 2025  · #437

बिटिया

प्यारे पापा, कभी कंधे पे खेलती थी आपके, आज कंधे तक आ जाती हूँ। फिर भी कुछ कह देते हो जोर से, मैं अब भी डर जाती हूँ। हो जाता है आपको ज़ुखाम भी , घर सारा सर पे उठा लेती हूँ। कर पाऊं आपकी, कुछ ख्वाहिशें पूरी , थोड़ा बहुत इसलिए कमा लेती हूँ। बेटा तो नहीं मैं आपका, आपने पर, बेटे से कभी खराब ना समझा। आगे भी करने देना मुझे बेटी बन कर , पापा, हर काम जो करता आपका बेटा। ...

October 14, 2017  · #365