साथ

ना जाने क्यों सोचते हैं किसी काबिल के नहीं, दरिया को भी मिलता है सहारा किसी साहिल से ही। धूप-छाँव, रात-दिन तो काट लेता है किसी तरह से, आँधियों में तो बरगद को भी उसकी जड़ें चाहिए ही। छत न हो तो महल भी लगता है यूं वीराना-सा, हाथ सिर पे हो तो सुकून मिलता है झुकने पर भी। दीवार गिरने पर भी दुबारा उठ सकती है, मगर शर्त ये है कि घर की बुनियाद न टूटे। ...

December 20, 2025  · #437

कुछ नहीं, मैं ठीक हूँ...

ना मिटा शिकन अपने चेहरे से, तेरी आँखें तेरा हाल-ए-बयाँ करती हैं। करते रहो पर्दा ऊपर के ज़ख्मो पर जितना भी, अन्दर लगी चोटें कहाँ छुपती हैं? होठों पर हँसी लाने की क्या ज़रुरत , पलकों पर जमी नमी साफ़ दिखती है। और उसपर ये कहना, “कुछ नहीं, मैं ठीक हूँ…”, ठीक न होने की हद और क्या हो सकती है? ~रबी [ Do not erase the uneasiness from your face, Your eyes are telling the whole story about your state. You can cover the wounds on your exterior, But how will you cover the internal bruises? ...

November 11, 2012  · #102