यादें

उड़ता है धुंआ, जलता मैं यहां, तेरी यादें जलती हैं, बता जाऊं मैं कहाँ ? जाऊं मैं कहाँ, पता मुझे कहाँ, तुझे भी नहीं पता, तो जा पूछ के आ। साले बता दे, आग लगी है, तन बदन में, किलस रही है। जो यादें जल रही थीं, पागल तेरी ही थीं, अब क्या फायदा, पहले बता देता, बच भी सकती थीं। इतना धुंआ, इतना धुंआ, खांस खांस के परेशां, साला जिसने आग लगाई, उसके पड़ोसी की भैंस की आँख। ...

October 14, 2014  · #260

मन होता है

तेरी आगोश में सोने को मन होता है, तुझसे लिपट कर कुछ कहने को मन होता है, तेरी आँखों में आँखें डाल कर, तेरी उँगलियों में उंगलियां कसा कर, तुझे गौर से देखने को मन होता है। जो सीने में मेरे जल रही है अर्सों से, वो आग तुझसे भिगोने को मन होता है, लगता है गरम चाशनी सा, तेरा बदन छूने को मन होता है। तेरे होटों से निकली उजली भाप में, आँखें सेंक लेने को मन होता है। ...

October 7, 2014  · #257

आँखें बंद करता था तो...

आँखें बंद करता था, तो नजर आता था, एक लहराता आँचल, एक ठहरा दरिया, टप टप करता झरना, तुम्हारे आने की आहट में, भीनी भीनी सी खामोशी, एक सुबह सोई सोई सी। एक बहती खुशबू हवा में, जो तुझसे पहले तेरे आने का पैगाम दे जाती थी , एक सिली सी नमी फिजा में , तेरे बालों से होकर मेरे चहरे को जो छू जाती थी। एक रास्ता संकरा सा, जिसपे हम चला करते थे, धीरे धीरे होले होले, बेसुध से, घंटों बातें किया करते थे। एक पीली पीली धूप चलती थी आगे आगे, जैसे हरे गलीचे पे रास्ता दिखाती हो। या कहीं ऐसा तो नही था, तेरे पैरों से लिपटने को, हर सुबह सब छोड़ कर चली आती हो। अब क्या पता, उसे भी तो तेरे साथ रहना पसंद था। ...

October 6, 2014  · #256

सुबह तेरी आवाज से शरू होती थी

सुबह तेरी आवाज से शरू होती थी , रात ढलती थी तेरे नाम से … बहुत कोशिश की, तुझे जेहन से निकालने की, तुम फिर भी आ जाते थे सपनो में कितने आराम से। तुम्हे क्या पता कितनी रातें हमने जाग कर गुजारी हैं, तुम्हे क्या पता कितने आंसूं हमने छिपकर हैं बहाए, तुम्हे तो लगता होगा तकलीफें सिर्फ तुम्ही को मिली हैं , तुम्हें क्या पता कितनी तकलीफ हम अपने अन्दर हैं दबाये। ...

October 5, 2014  · #255

मैं फिर भी ठीक हूँ

ज़िन्दगी ऐसा लगता है ठहर सी गयी गई है, मैं आगे निकल गया वो पीछे कहीं रह गयी है , बहुत कोशिश की, कि ज़िन्दगी से मुलाकात तो हो, पर ज़िन्दगी तो लगता है जैसे मर सी गयी है। इश्तेहार दिया, ज़िन्दगी जहां भी हो लौट आओ, पर ज़िन्दगी है की ना ज़िंदा ना मुर्दा मिलती है। पर मैं फिर भी ठीक हूँ। ऐसा नहीं है की मैं हँसता नहीं हूँ, ऐसा नहीं है की मैं खुश रहता नहीं हूँ, रोज सुबह ज़िंदा उठता तो मैं अब भी हूँ, रोज अपने आप से ही हार जाना दुखता तो है, फिर भी हर शाम खुद से लड़ता तो मैं अब भी हूँ, खुद से नाराज, रब से नाराज, सब से नाराज हूँ। पर मैं फिर भी ठीक हूँ। ...

October 4, 2014  · #254

मोहब्बत

मैंने कहा खुदा से तूने सबको दी , थोड़ी मोहब्बत मेरे हिस्से भी लिख दे। खुदा ने कहा तू बदनसीब है रबी , मोहब्बत तेरे मुकद्दर में नहीं। लोग चोट खाते हैं अक्सर इश्क में, तुझे इश्क ही चोट देता रहेगा। मत चाहना किसी को, भूल कर भी , जिसे चाहेगा, वो तुझसे दूर ही रहेगा। न कर मोहब्बत किसी से, वर्ना समझ ले , मोहब्बत तेरे पास तो रहेगी, पर तुझे कभी मिल न सकेगी। ...

October 2, 2014  · #253

तुम्हे ज़न्नत ले चलूँ

मुझे परवाह नहीं कोई मुझ पर लिखे , मैं मुन्तजिर हूँ उसका जिस पर मैं लिख सकूं, जिसपे हक हो मेरा, सिर्फ मेरा, कोई और नहीं, वो शायरी बने तो मैं खुद को शायर कह सकूं। कश्तियाँ आती तो बहुत हैं, लेकिन कोई रूकती नहीं, मैं फिर भी साहिलों के किनारे बैठा रहता हूँ। इस उम्मीद में कि कोई तो रुकेगा, कभी, कहेगा, चलो… तुम्हे ज़न्नत ले चलूँ। ~रबी [ I do not care if someone writes for me, I await the one for whom I can write, Who is rightfully mine, only mine, no one else’s, If she becomes the ​​poetry, I can call myself poet. ...

October 1, 2014  · #252

कहो तुम पर क्या लिखूं ?

ये जो तुम रोज रोज कहा करती हो, हमारे लिए भी कुछ लिखा करो। तुम्हे पता है कितना मुश्किल होता है, जब इस बात का ही कुछ पता न हो, की किस किस अदा पर लिखूं, किस किस बात को रहने दूँ। चलो ठीक है, बोलो कहाँ से शुरू करूँ ? क्या इन बालों को किसी नागिन की अंगड़ाई कह दूँ ? या इन्हे किसी दिल-फैंक शायर की स्याही कह दूँ ? अहह… हद है। ऐसा भी कोई कहता है भला ? काली रात से बालों को देखकर, मुंह से कुछ और कभी निकलता है भला ? ...

September 28, 2014  · #251

मुस्कुराने (Reprise)

तुम हाँ कहो न कहो, तुम ना भी मत कहना, जैसे भी हो भोले भाले, वैसे ही रहना। मुस्कुराने की वजह तुम हो, गुनगुनाने की वजह तुम हो। जिया जाए न जाए न जाए ना , ओ रे पिया रे। एक बार तो कहो, छीन लायेंगे हम, रूखा सूखा जैसे भी हो, खा ही लेंगे संग। [ एक बार तो कहो, छीन लायेंगे तुम्हे, रूखा ही हो, सूखा ही हो, खिला तो देंगे तुम्हें। ] जिया जाए न जाए न जाए ना, ओ रे पिया रे। ...

September 24, 2014  · #250

सांस एक आखिरी

जब रह जायेगी सांस एक आखिरी, आधी तुझे दूंगा, आधी खुद रख लूंगा, डर लगे तुझे सोते हुए तो, नींद अपनी भी दे दिया करूँगा। मुश्किलें आएँगी तो हाथ पकड़ लेना, हर मुश्किलों से मेहफ़ूज़ तुझे रखूँगा। ढूंढना नहीं पड़ेगा कभी, जब जब पलकें उठेंगी, तेरे सामने ही मिलूंगा। चाहे खुद को गिरवी रख सही, तेरी हर ख्वाइश मैं पूरी करूँगा। बस न जाना छोड़ कर, सच कहता हूँ इस बार, तुझे तुझसे छीन लूंगा , नोच डालूँगा तुझे हर कतरा कतरा, या मार ही दूंगा, या खुद मर मिटूँगा। ...

September 21, 2014  · #249